पैरेंटिंग का पहला कदम: अपनी भावनाओं को पहचानें

"बच्चों की भावनाएं समझें: को-रेग्युलेशन क्यों है आज की सबसे ज़रूरी पेरेंटिंग स्किल?"

हर माता-पिता उस पल से गुज़रते हैं जब उनका बच्चा गुस्से में चिल्ला रहा होता है, रो रहा होता है या बस बिना वजह चुपचाप एक कोने में बैठा होता है। हम सोचते हैं—क्या हुआ इसे? कैसे समझाएं? कहां चूक हो गई?

बच्चों की भावनाएं समझें: को-रेग्युलेशन क्यों है आज की सबसे ज़रूरी पेरेंटिंग स्किल?




ऐसे समय में “को-रेग्युलेशन” (Co-Regulation) एक बेहद कारगर तरीका बनकर उभरा है। ये कोई जादू नहीं, बल्कि एक अभ्यास है—जिसमें हम बच्चों की भावनात्मक लहरों को नज़रअंदाज़ नहीं करते, बल्कि उन्हें थामते हैं, साथ चलते हैं।

क्या है को-रेग्युलेशन?

को-रेग्युलेशन का मतलब है: बच्चे के साथ मिलकर उसकी भावनाओं को समझना, उन्हें शांत करना और यह सिखाना कि भावनाएं कोई दुश्मन नहीं, उन्हें महसूस करके नियंत्रित किया जा सकता है।

बाल मनोविज्ञानी लॉरेन मर्चेंट कहती हैं—“ये केवल बच्चे को चुप कराने की कला नहीं, बल्कि एक ऐसा रिश्ता है जहां हम पहले खुद को समझते हैं ताकि बच्चे को बेहतर समझ सकें।”



जब बच्चा परेशान हो, तो क्या करें?

1. सबसे पहले खुद को संभालें

बच्चे की बेचैनी देखकर तुरंत प्रतिक्रिया देने की जगह एक गहरी साँस लें। सोचिए—आपका टोन, आपका चेहरा, आपकी ऊर्जा क्या कह रही है? क्योंकि बच्चे सबसे पहले इन्हीं चीज़ों को पढ़ते हैं।

2. भावनाओं को स्वीकारें, दबाएँ नहीं

कहें:

  • “तुम्हें गुस्सा आ रहा है, मैं समझ सकती हूँ।”

  • “तुम उदास लग रहे हो, चलो बैठकर बात करते हैं।”

इससे बच्चे को लगेगा कि उसकी भावना सही है और उसे अपनाया जा रहा है—not judged.

3. सिर्फ बात नहीं, स्पर्श और मौन भी असर करता है

कभी-कभी एक हल्का हाथ थामना, एक गले लगाना या आंखों में देखना—ये सब बिना शब्दों के गहरा असर करते हैं। यह उन्हें सुरक्षित महसूस कराता है।



क्यों ज़रूरी है को-रेग्युलेशन?

बच्चे के लिए

  • वह गुस्से, निराशा, डर जैसे भावों से भागने की बजाय उन्हें पहचानना और मैनेज करना सीखता है।

  • निर्णय लेने में परिपक्वता आती है।

  • आत्म-संयम विकसित होता है।

माता-पिता के लिए

  • रिश्ते में भरोसा बढ़ता है।

  • संवाद मजबूत होता है।

  • गिल्ट और झुंझलाहट में कमी आती है।



को-रेग्युलेशन को कैसे करें अपने जीवन में लागू?

रोज़ के अभ्यास:

  • दिन में 5 मिनट बच्चे के साथ बिना फोन के बैठिए।

  • हर रात सोने से पहले एक ‘feelings check-in’ कीजिए: “आज तुमने सबसे ज्यादा क्या महसूस किया?”

  • कभी-कभी अपनी भी भावनाएं शेयर करें। जैसे: “आज मम्मी को थोड़ा थकान महसूस हो रही है।”

सीमाओं के साथ स्वतंत्रता

बच्चे को उसकी भावना प्रकट करने दें, लेकिन यह भी बताएं कि हिंसा या चिल्लाना सही तरीका नहीं।
उदाहरण: “मैं समझता हूँ कि तुम नाराज़ हो, लेकिन मारना ठीक नहीं। चलो किसी और तरीके से गुस्सा निकालते हैं।”



विशेषज्ञों की राय क्या कहती है?

हार्वर्ड विमेन्स हेल्थ वॉच की मौरीन सैलेमन कहती हैं:

“बच्चों की भावनात्मक दक्षता विकसित करने के लिए जरूरी है कि वे अपनी भावनाओं को समझें, खुद से दयालुता से पेश आएं, और समाधान की ओर सोचें। यह एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन बेहद फलदायक।”



को-रेग्युलेशन से सेल्फ-रेग्युलेशन तक

शुरुआत में बच्चा अपने भावों को खुद नहीं संभाल पाता। पर जब बार-बार उसे सहारा मिलता है, समझने का मौका मिलता है, तो धीरे-धीरे वो खुद ही अपने भावों को मैनेज करना सीख जाता है। इसे ही कहते हैं—सेल्फ-रेग्युलेशन



अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. क्या को-रेग्युलेशन हर उम्र के बच्चों पर लागू होता है?

हाँ। यह खासकर छोटे बच्चों और किशोरों के लिए जरूरी है, लेकिन बड़ों के साथ भी भावनात्मक जुड़ाव इसी सिद्धांत से मज़बूत होता है।


Q2. अगर बच्चा बार-बार रोता या गुस्सा करता है तो क्या करें?

पहले ये समझें कि रोना/गुस्सा करना उसकी भाषा है। उसके पीछे का कारण जानने की कोशिश करें। डांटने की बजाय संवाद बनाएं।


Q3. क्या यह टेक्निक वर्किंग पेरेंट्स भी अपना सकते हैं?

बिलकुल। आपको पूरे दिन साथ रहने की ज़रूरत नहीं, बल्कि थोड़े समय में भी “emotionally present” रहना ज़्यादा असर करता है।


Q4. इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी गलती क्या होती है?

जब हम खुद तनाव में होते हैं और बच्चे की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं या उन्हें ‘ओवर-रिएक्ट’ कहकर दबा देते हैं। यही सबसे आम गलती है।


Q5. क्या हर बार बच्चे को सांत्वना देना उन्हें कमजोर बना देगा?

नहीं। उन्हें समझाना, साथ देना और भावनाएं स्वीकार करना उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है—not dependent.



निष्कर्ष

को-रेग्युलेशन कोई कठिन तकनीक नहीं है। ये एक अभ्यास है—एक सोच है। जब हम अपने बच्चों की भावनाओं को दबाने की बजाय उन्हें अपनाते हैं, तो हम उन्हें सिर्फ मजबूत नहीं बनाते, बल्कि उनके साथ एक आज़ाद, गहराईभरा रिश्ता भी बनाते हैं।

भावनाएं संक्रामक होती हैं। अगर हम शांति देंगे, तो वही लौटकर आएगा।



डिस्क्लेमर:

यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी मानसिक स्वास्थ्य स्थिति में विशेषज्ञ से सलाह ज़रूर लें।



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