महिलाओं का गुस्सा: एक सामाजिक दृष्टिकोण
"अच्छी लड़कियां गुस्सा नहीं करतीं।"
यह वाक्य हम सबने कभी न कभी सुना है — घर में, स्कूल में, फिल्मों में। लेकिन अब समय बदल रहा है। अब महिलाएं न सिर्फ गुस्सा कर रही हैं, बल्कि उसे मुखरता से अभिव्यक्त भी कर रही हैं। उनका गुस्सा अब कविता, कॉमेडी, फिल्में, गाने और सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी जगह बना रहा है।
लेकिन सवाल यह है: क्या यह गुस्सा समाज को बदल रहा है या बस स्क्रीन तक सीमित रह गया है?
गुस्सा जो सदियों से जमा था
मनोविज्ञानियों का कहना है कि महिलाओं का गुस्सा कोई नई चीज़ नहीं है — यह सदियों से मौजूद है। बस फर्क इतना है कि इसे हमेशा दबा दिया गया, इसे "अशिष्ट", "अवांछनीय" और "असली महिला" के खिलाफ माना गया।
प्रशस्ति सिंह, एक मशहूर स्टैंड-अप कॉमेडियन, कहती हैं, "बोलती औरत किसी को पसंद नहीं आती।"
उनके शो Divine Feminine में वह अपने अनुभवों और समाज के ढोंग को मज़ाक के जरिये उधेड़ती हैं। यह सिर्फ हंसी का मंच नहीं, बल्कि वह मंच है जहां स्त्रियों का दमित गुस्सा धीरे-धीरे हल्का होता है।
आर्ट और सोशल मीडिया में गुस्से की लहर
जहाँ पहले गुस्साई औरतें सिर्फ फिल्मी खलनायिकाएं होती थीं, अब वे नायिकाएं बन रही हैं।
फिल्में जैसे थप्पड़, द ग्रेट इंडियन किचन, मिसेज और पगलैट गुस्से की उस परत को दिखाती हैं, जो धीरे-धीरे भीतर ही भीतर जलती है। यह गुस्सा चिल्लाता नहीं, पर हर सीन में महसूस होता है।
पटकथा लेखिका प्रांजलि दुबे सोशल मीडिया रील्स में अपने अनुभवों को साझा करती हैं — स्कूल, घर, रिश्ते — जहाँ एक लड़की को बार-बार यह कहा जाता है, “ज़्यादा मत बोलो, ज़्यादा मत सोचो।” अब वह सब खुलकर कहती हैं।
क्रोध के पीछे का आँकड़ा
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक:
-
2011 में महिला विरोधी अपराध: 2,28,650
-
2021 में यह बढ़कर: 4,28,278 (87% की वृद्धि)
क्या यह डेटा किसी और बात की तरफ इशारा नहीं करता? कि स्त्रियों का गुस्सा कोई "नखरा" नहीं, बल्कि व्यवस्थागत हिंसा का जवाब है।
गीत जो गुस्से की आवाज़ बनें
ब्रिटिश गायिका पेरिस पालोमा का गाना Labour अब सिर्फ एक गाना नहीं रहा — यह एक आंदोलन बन चुका है। इसमें वो सब कहा गया है जो महिलाओं को सालों से नहीं कहने दिया गया।
"पूरे दिन, हर दिन – डॉक्टर, मां, नौकरानी –
अप्सरा बनो, मगर कुंवारी रहो,
नर्स बनो, मगर पूछो मत क्यूँ।"
यह गीत इंस्टाग्राम पर 30,000 से ज्यादा रील्स में इस्तेमाल हो चुका है — वह भी आम महिलाओं द्वारा। यह उनके गुस्से की आवाज बन गया है।
गुस्सा अभी भी स्वीकार नहीं किया गया है
फिर भी, असली दुनिया में महिलाओं का गुस्सा आज भी "परेशानी" समझा जाता है। अगर कार्यस्थल पर कोई महिला गुस्से में बोल दे, तो उसे “मुश्किल महिला” कहा जाता है। अगर वह घर में गुस्सा करती है, तो उसे "संस्कारी नहीं" कहा जाता है।
महाभारत की द्रौपदी को क्रोधित होने का हक़ मिला, क्योंकि वह अपने पतियों के लिए लड़ रही थी। लेकिन अगर कोई महिला आज अपने लिए बोले, तो उसे “ज़्यादा बोलने वाली” कहा जाता है।
क्रोध: विनाश नहीं, परिवर्तन की ऊर्जा
राजनीतिक विश्लेषक स्वर्णा राजगोपालन लिखती हैं:
"गुस्सा सृजन, संरक्षण और विनाश – तीनों का स्रोत हो सकता है।
इसे दबाइए मत, इसे दिशा दीजिए।"
हमें महिलाओं के गुस्से को "समस्या" की तरह नहीं, बल्कि परिवर्तन की चिंगारी की तरह देखना चाहिए। यह गुस्सा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि कौन-से ढांचे अब टूटने चाहिए।
गुस्सा अब जुड़ाव का माध्यम है
आज महिलाएं अकेली नहीं हैं। सोशल मीडिया, कॉमेडी मंच, फिल्में — ये सब उनके क्रोध को मंच और समर्थन दे रहे हैं। प्रांजलि की रील्स पर कमेंट करने वाली हजारों महिलाएं एकजुटता दिखाती हैं। प्रशस्ति के शो में बैठी हर महिला तालियों से कहती है — "हम तुम्हारे साथ हैं।"
FAQs: महिलाओं के गुस्से को लेकर सामान्य सवाल
1. क्या गुस्से से औरतें "खराब" दिखती हैं?
बिलकुल नहीं। यह सोच समाज की पितृसत्तात्मक धारणा से उपजी है। गुस्सा करना एक स्वाभाविक मानवीय भावना है, और महिलाओं को भी इसका अधिकार है।
2. क्या महिला गुस्से से समाज में बदलाव आ सकता है?
हाँ। इतिहास गवाह है — जब भी महिलाओं ने आवाज़ उठाई, बदलाव आया। मीटू आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
3. क्या महिलाएं गुस्से को स्वस्थ रूप में प्रकट कर सकती हैं?
ज़रूर। लेखन, कला, एक्टिविज़्म, बातचीत, चिकित्सा, और आत्म-अभिव्यक्ति के अनेक साधन मौजूद हैं। गुस्सा विनाश नहीं, चेतना का माध्यम बन सकता है।
4. क्या गुस्से की अभिव्यक्ति सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित है?
अभी हाँ, पर यह शुरुआत है। असल ज़िंदगी में इस गुस्से को मान्यता देने की प्रक्रिया अभी भी संघर्षशील है। लेकिन महिलाएं अब पीछे हटने वाली नहीं हैं।
✍️ निष्कर्ष: गुस्सा अब चुप नहीं रहेगा
महिलाओं का गुस्सा अब न तो छिपा हुआ है और न ही शर्म का विषय।
यह गुस्सा अब कविता बनता है, स्क्रीन पर उतरता है, स्टेज से झांकता है — और बदलाव का बीज बोता है।
हमें इस गुस्से को कुचलने की नहीं, समझने की ज़रूरत है।
यह गुस्सा एक नई, ज्यादा समान और ज्यादा मानवीय दुनिया का रास्ता खोल सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी हेतु है। किसी भी मानसिक, सामाजिक या कानूनी सलाह के लिए संबंधित विशेषज्ञ से परामर्श करें।

.png)
%20(1).png)